धर्म के रास्ते पर चलने वाले लोगों को बुरा फल क्यों मिलता है ?

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अच्छा कार्य करने वाले मानव को उसके कर्मो का फल मिलता है। अपने जो कुछ भी शुभ-अशुभ कर्म किए हैं वह अवश्य ही भोगना पड़ता है। चलिए इस कथन को एक कथा के माध्यम से समझते हैं: एक बार देवर्षि नारद बैकुंठ धाम गए। प्रणाम निवेदित करने के बाद नारद जी ने श्रीहरि से कहा, ‘‘प्रभु, पृथ्वी पर अब आपका प्रभाव कम होता जा रहा है। धर्म पर चलने वालों को कोई अच्छा फल नहीं मिल रहा, जो पाप कर रहे हैं उनका भला हो रहा है।’’ तब श्रीहरि ने कहा, ‘‘ऐसा नहीं है देवर्षि, जो भी हो रहा है सब नियति के माध्यम से हो रहा है।’’ नारद बोले, ‘‘मैं तो देखकर आ रहा हूं, पापियों को अच्छा फल मिल रहा है और भला करने वाले, धर्म के रास्ते पर चलने वाले लोगों को बुरा फल मिल रहा है।’’ भगवान ने कहा, ‘‘कोई ऐसी घटना बताओ।’’ नारद ने कहा, ‘‘अभी मैं एक जंगल से आ रहा हूं, वहां एक गाय दलदल में फंसी हुई थी। कोई उसे बचाने वाला नहीं था। तभी एक चोर उधर से गुजरा, गाय को फंसा हुआ देखकर भी वह नहीं रुका, वह उस पर पैर रखकर दलदल लांघकर निकल गया। आगे जाकर चोर को सोने की मोहरों से भरी एक थैली मिली।थोड़ी देर बाद वहां से एक वृद्ध साधु गुजरा। उसने उस गाय को बचाने की पूरी कोशिश की। पूरे शरीर का जोर लगाकर उसने उस गाय को बचा लिया लेकिन मैंने देखा कि गाय को दलदल से निकालने के बाद वह साधु आगे बढ़ा तो कुछ ही दूर चलने पर उसके पैर में कील चुभ गई। प्रभु बताइए यह कौन-सा न्याय है? नारद जी की बात सुन लेने के बाद प्रभु बोले, ‘‘तुमने जितना देखा उसी आधार पर नतीजा निकाल लिया। सच्चाई यह है कि जो चोर गाय पर पैर रखकर भाग गया था उसे तो उस दिन खजाना मिलना था लेकिन अपने बुरे कार्यों के चलते वह केवल कुछ मोहरें पा सका। जिस साधु ने गाय को बचाया उसे उस दिन सूली पर चढ़ाया जाना था लेकिन अपने अच्छे कर्मों की बदौलत वह सूली पर चढ़ने से बच गया। उसे सिर्फ कील चुभने का ही कष्ट सहना पड़ा।’

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