जब भस्मासुर का अंत करने के लिए भगवान विष्णु ने रचा मोहिनी रूप

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दोस्तों ज्ञान और दान हमेशा उसको देना चाहिए जो उसके सुपात्र हो. यानी जो उसको ग्रहण करने के काबिल हो. आपको एक छोटी सी प्रेरक कथा सुनाती हूँ. पूर्व काल में भस्मासुर नाम का एक राक्षस हुआ करता था। उसकी लालसा थी की वो पूरे विश्व पर राज करे. अपनी इस मंसा को पूरा करने के लिए वह भगवान शिव की उपासना में दिन-रात लीन होकर कठोर तपस्या करने लगा. दूसरी तरफ जिनके नाम में ही भोले है यानी बच्चे जैसी मासूमियत रखने वाले भगवान भोलेनाथ राक्षस भस्मासुर की तपस्या से प्रसन्न हो कर उस के सामने प्रकट होते हैं। शिव उसे वरदान मांगने के लिए कहते हैं। तब भस्मासुर अमरत्व का वरदान मांगता है। अमर होने का वरदान सृष्टि के नियमो के विरुद्ध होने के कारण भोलेनात ने कहाँ कोई दूसरा वर माँगो. तब भस्मासुर अपनी मांग बदल कर यह वरदान मांगता है की वह जिसके भी सिर पर हाथ रखे वह भस्म हो जाए। भोलेनाथ उसे यह वरदान दे देते हैं। तब भस्मासुर भोलेनाथ को ही भस्म करने के लिए दौड़ पड़ा. भोलेनाथ स्वयम् दुविधा में पड़ जाते हैं. वह विचार करते हैं कि कैसा राक्षस है ये ' मुझसे ही वरदान पाकर मेरे ही विनाश की चेस्टा कर रहा है. भोलेनाथ भगवान विष्णु की शरण में जाते हैं और उन्हे अपनी दुविधा बताते हैं। भगवान विष्णु फिर भस्मासुर का अंत करने के लिए मोहिनी रूप रचते हैं। भस्मासुर जब भटक भटक कर शिवजी को भस्म करने के लिए ढूंढ रहा होता है तब मोहीनी रूप धारण किए हुए भगवान विष्णु उसके समीप प्रकट होते है। मोहिनी की सुंदरता से मुग्ध हो कर भस्मासुर वहीं ठहर जाता है। और मोहिनी से विवाह का प्रस्ताव रख देता है। मोहिनी जवाब में कहती है कि- वह सिर्फ उसी युवक से विवाह करेगी जो उसकी तरह नृत्य में प्रवीण हो। अब भस्मासुर को नृत्य आता नहीं था तो उसने इस कार्य में मोहिनी से मदद मांगी। मोहिनी तुरंत तैयार हो गयी। नृत्य सिखाते-सिखाते मोहिनी ने अपना हाथ अपने सिर पर रखा और उसकी देखा-देखी भस्मासुर भी भोलेनाथ का वरदान भूल कर अपना ही हाथ अपने सिर पर रख बैठा और खुद ही भस्म हो गया। इस तरह विष्णु भगवान की सहायता से भोलेनाथ की विकट समस्या का हल हो जाता है। दोस्तों इसलिए भगवान शिव को भोलेनाथ कहा गया है क्योकि उनसे वरदान पाना सबसे आसान है. भोले ही ऐसे भगवान है जो अहंकार, क्रोध, चालाकी सबकुछ भूल कर बस अपने भक्तो की कामना के लिए दौड़ पड़ते हैं.

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