श्रीमद भगवद गीता सार-अध्याय 1-13/14 अगर हौसला है तो कोई कार्य भी

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हरे कृष्ण: साथियो पिछले अंक में हमने जाना कि भयलिप्त दुर्योधन को खुश करने के लिए कुरुवंश के वयोवृद्ध परम प्रतापी एवं पितामह भीष्म सिंह के गर्जना स्वरूप शंखनाद करते हैं. अब आगे तत: शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखा: । सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥ साथियों भीष्म के शंखनाद के तत्पश्चात् शंख, नगाड़े, बिगुल, तुरही तथा सींग एकसाथ बज उठे। यह भीषण ब्रह्मा युद्ध आरंभ करने की उद्घोषना हो गयी थी. भिन्न भिन्न प्रकार के इन बाजो की ध्वनि मिलकर जो नाद उठ रही थी वह बहुत ही डरावना बहुत ही भयानक थी. तत: श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ । माधव: पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतु: ॥ दूसरी ओर से श्वेत घोड़ों द्वारा खींचे जाने वाले विशाल रथ पर आसीन कृष्ण तथा अर्जुन ने अपने-अपने दिव्य शंख बजाये। साथियों एक तरह जहाँ भीष्मदेव द्वारा बजाये गए शखं से भय का वातावरण उत्तपन्न हुआ उसकी तुलना में कृष्ण तथा अर्जुन के शंखों को दिव्य कहा गया है।दिव्य मतलब है अलौकिक. जो सारे लोकों से परे हो. मृत्युलोक, देवलोक, ब्रह्मलोक से भी परे जहाँ जीवन मरण का प्रश्न ना हो. योगेश्वर श्री कृष्ण ऐसा ही दिव्य शंखनाद करते हैं. साथियों शंखनाद आज के युग लिए हौसले का प्रतीक है. यह जोश का प्रतीक है. हमे इससे सीखना चाहिए कि जब भी हम कोई कार्य करने की ठाने या शुरू करने जाए तो उस कार्य को पूरे जोश के साथ करना चाहिए. पूरे हिम्मत और हौसले के साथ करना चाहिए. अगर आपमें हौसला है कि यह कार्य मुझे किसी भी रूप में करना है तो विजय पक्की है. श्री कृष्ण के दिव्य शंखनाद से भी पांडव की ऐसे हे विजयघोष की अनुभूति होती है.

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