विपरीत परिस्थिति में जीने की कला सिखाते हैं भगवान श्री कृष्ण

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नमस्कार, अध्यात्म की तलाश में आप सभी अनमोल लोगो को प्रणाम. आजकल परिस्थितियाँ विपरीत है, महामारी का भय, पाव पसार रहा है. ऐसे में प्रश्न उठता है की हमें क्या करना चाहिए हमारा आचरण कैसा होना चाहिए. व्यासजी के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के 4 गुण थे जिन्हें हमें विपरीत परिस्थिति में अपनाना चाहिए पहली कला है प्रसन्नता. भक्ति के मार्गपर चलना चाहते हो तो प्रसन्नता को चेहरे पर से जाने मत दो। श्रीकृष्ण विपत्तियां देखने के बाद मुस्कुराते थे। विपत्तियां आएं तो घबराओ नहीं, मुस्कुराओ, हिम्मत जुटाओ। हिम्मत आएगी तो विपत्तियां टल जाएंगी। दुःख के बादल जब घिरते हैं उस समय किसी अपने को आते देखकर रोना आ जाता है। यही हाल द्रौपदी का हुआ था जब श्रीकृष्ण उनके सामने आए। श्रीकृष्ण ने उन्हें कहा था, द्रौपदी जो बीत गया उसको सोच-सोचकर अपनी हिम्मत ना हारो, भविष्य को सोच-सोचकर मत डरो और वर्तमान में हिम्मत जुटाओ। द्रौपदी बोली, ‘आपने दुःख नहीं देखा, आप मेरा दुःख कैसे समझोगे।’ श्रीकृष्ण का इस पर कहना था कि जिसका जन्म ही जेल में हुआ हो उसने क्या कम दुःख देखा है दुःख सामने आया है दुःख को दुःख समझा नहीं है। 2- मुसीबत जब आए तो माथे को गर्म नहीं होने देनाµअर्थात् दिमाग को संतुलित नहीं करेंगे तो बुद्धि चकराने लग जाती है और फेल हो जाती है। 3- मुसीबत के समय वाणी को कठोर नहीं होने देना चाहिए। 4- मुसीबत से हाथ-पांव में जोश बढ़ जाना चाहिए। सुख बहुत भोगा है, दुःख में संघर्ष करना है इसीलिए तैयार हो जाओ।इस आपदा से भी जीत हमारी ही होगी.

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