जानिए महाभारत में कैसे टूटा अभिमान में चूर भीम का घमंड

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दोस्तों हमें कभी अपने बल, बुद्धि, कौशल और सुंदरता पर घमंड नहीं करना चाहिए। क्योकि घमंड असफलता की पहली सीढ़ि है. महाभारत में घमंड के नशे में चूर कौरवों की सेना और दुर्योधन का क्या हुआ यह आप जानते ही हैं. घमंड हमें पराजय और विनाश की तरफ धकेलता है. महाभारत की ही एक छोटी सी कथा के मध्यम से आपको समझती हूँ. एक बार पांडवों के पांच भाइयों में से एक बलशाली भीम को अपने बल, अपने ताक़त पर अभिमान यानी घमंड हो गया. वनवास काल की बात है एक दिन बलशाली भीम वन की ओर विचरते- विचरते दूर निकल गये. रास्ते में उन्हे एक वृद्ध वानर मिलता है। वानर की पूँछ भीमसेन के रास्ते में बिछी होती है। तभी भीम उसे अपनी पूँछ दूर हटा लेने को कहते हैं। परंतु वृद्ध वानर कहता है, “अब इस आयु में मुझसे बार-बार हिला-डुला नहीं जाता तुम तो काफी हट्टे-कट्टे हो, एक काम करो तुम ही मेरी पूँछ को हटा कर आगे बढ़ जाओ।” भला भीम के लिए एक कमजोर वृद्ध वानर की पूँछ हटाना कौन सा पहाड़ था. भीम ने बोला इसे तो पलभर में हटा देता हूँ. इसी अभिमान में चूर भीम अथक प्रयास करते हैं, लेकिन वानर राज की रास्ते में बिछी पूँछ एक इंच भी टस से मस नही होती है.पसीने से लथपथ भीम साँझ जाते हैं कि यह वानराज़ कोई साधारण बंदर नही बल्कि ज़रूर कोई दिव्य वानर है. अंत में भीमसेन उन्हे हाथ जोड़ कर प्रणाम करते हैं और उन्हे अपना परिचय देने का विनम्र आग्रह करते हैं। दरअसल वृद्ध वानर कोई और नही स्वयं हनुमान जी थे जो भीम को अपना अहंकार तोड़ने के लिए वृद्ध वानर का रूप धारण किए हुए थे. इसलिए दोस्तों हमे कभी धमंड नही करना चाहिए.

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