गुडगाँव का प्रसिद्द शीतला माता मंदिर

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गुड़गांव का नाम आते ही सबसे पहले हमारे जहन में एक बड़ी बड़ी चमकदार ईमारतों वाले शहर की तस्वीर उभरती है और साइबर सिटी हमारे दिमाग में आ जाती है। लेकिन जब हरियाणा, उत्तर प्रदेश विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान के गांव में आप जब भी गुड़गांव का जिक्र करेंगें अनायास ही लोगों के जहन में गुड़गावां वाली माता आती है।  गुड़गांव में स्थित शीतला मंदिर में वैसे तो देश भर के श्रद्धालु आते हैं लेकिन ज्यादा संख्या हरियाणा उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान के श्रद्धालुओं की होती है। कहा जाता है कि सत्रहवीं सदी में महाराजा भरतपुर ने गुड़गाँव में माता कृपि के सती स्थल पर मन्दिर का निर्माण करवाया और सवा किलो सोने की माता कृपी की मूर्ति बनवाकर वहां स्थापित करवायी। बाद में किसी मुगल बादशाह ने मूर्ति को तालाब में गिरवा दिया जिसे बाद में माता के दर्शन के बाद सिंघा भक्त ने निकलवाया। बताया जाता है कि सिंघा भगत के तप को देखकर क्षेत्रीय लोग उनके पांव पूजने लगे थे। इस  मंदिर को महाभारत काल से जोड़कर भी देखा जाता है। मान्यता है कि महाभारत काल में गुरु द्रोणाचार्य यही पर कौरवों और पांडवों को अस्त्र-शस्त्र विद्या का ज्ञान दिया करते थे। जब महाभारत युद्ध में गुरु द्रोण वीरगति को प्राप्त हुए तो उनकी पत्नी उनके साथ सती हो गई। माना जाता है कि लोगों के लाख मनाने पर भी वे नहीं मानी और 16 श्रृंगार कर सती होने का निश्चय लेकर गुरु द्रोण की चिता पर बैठ गई। नवरात्र के दिनों में शीतला माता के मंदिर में भारी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। दोनों नवरात्रों में एक महीने तक मेला लगता है। इस दौरान लगभग 50 लाख श्रद्धालु माता के दर्शन करने आते हैं। साल में दो बार चैत्र नवरात्र और आश्विन नवरात्र के समय शीतला माता के इस मंदिर का नजारा अद्भुत होता है।

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