बाण से कैसे बनी यह झीलें?

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पराशर झील के किनारे आकर्षक पैगोडा शैली में पराशर मंदिर निर्मित है। इस मंदिर को 14वीं शताब्दी में मंडी रियासत के राजा बाणसेन ने बनवाया था। कला संस्कृति प्रेमी पर्यटक मंदिर प्रांगण में बार-बार जाते हैं। कहा जाता है कि जिस स्थान पर मंदिर है वहां ऋषि पराशर ने तपस्या की थी। मंदिर के बाहरी तरफ व स्तंभों पर की गई नक्काशी अद्भुत है। इनमें उकेरे देवी-देवता, सांप, पेड-पौधे, फूल, बेल-पत्ते, बर्तन व पशु-पक्षियों के चित्र क्षेत्रीय कारीगरी के नमूने हैं। परसोन मंदिर के महंत अमरदास बताते हैं कि ऋषि पाराशर ने अपने बल और तप से इस भूमि को शक्तियों से भर दिया था, इसलिए इस क्षेत्र का नाम परसोन पड़ा। उन्होंने बताया कि महर्षि पाराशर के पुत्र महर्षि वेद व्यास ने 18 महापुराणों और महान ग्रंथ महाभारत की रचना की थी। मान्यता है कि महर्षि वेद व्यास का जन्म इसी स्थल पर हुआ था। ऋषि पाराशर ने अपने तप से इस भूमि को शक्ति प्रदान की। महंत बताते हैं कि इस क्षेत्र का उल्लेख पाराशर ज्योतिष संहिता में मंगला वनी के नाम से किया गया है। इसी भूमि पर द्वापर युग में अज्ञातवास के दौरान माता कुंती के साथ पांडवों ने भी तप किया था। महंत अमरदास के मुताबिक, यहां पर महर्षि पाराशर का प्राचीन धूना अब भी सुरक्षित रखा है, जिसमें यहां रहने वाले साधु लगातार अग्नि प्रज्ज्वलित रखता है।

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