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भारत में इतनी तेजी से क्यों बढ़ रहा है मानसिक विकारों का बोझ

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मानसिक स्वास्थ्य पर हम सभी कभी इतना गौर नहीं करते थें क्योंकि ये हमारे लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं होता था लेकिन समय के साथ साथ लोग जागरूक होने लगे और इसकी महत्वत्ता को भी समझने लगे हैं। वहीं बात करें भारत की तो यहां भी अब धीरे धीरे मानसिक विकारों से जुड़ी समस्याएं गंभीर रूप लेती जा रही हैं।

ये हम नहीं कह रहे हैं बल्कि कई सारे शोध में यह पता चला है कि साल 2017 में करीब बीस करोड़ भारतीय मानसिक विकारों से ग्रस्त पाए गए थें और अब ये आंकड़ा और भी तेजी से बढ़ता जा रहा है। साल 1990 से साल 2017 के बीच भारत में बीमारियों के कुल बोझ में मानसिक बीमारियों का योगदान बढ़ कर दोगुना हो गया। वहीं कोरोना काल में हुए इस लॉकडाउन के कारण तो मानसिक रोगियों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है।

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भारत में बढ रहा मानसिक विकारों का बोझ

ऐसा इसलिए है क्योंकि लॉकडाउन के चलते बिजनेस, नौकरी, बचत और यहां तक कि मूलभूत संसाधन खोने के डर से लोगों में चिड़चिड़ापन, गुस्‍सा और नेगेटिव विचार हावी हो रहे हैं। घरेलू विवाद बढ़ रहे हैं तो बच्‍चे भी अछूते नहीं हैं। लॉकडाउन की अवधि लंबी होने के चलते घरों में कैद लोगों के दिनचर्या में बदलाव का असर मनोविकार के रूप में सामने आने लगा है। इनमें अवसाद और व्यग्रता सबसे आम मानसिक विकार हैं। इतना ही नहीं, ये दोनों मानसिक विकार भारत में तेजी से फैल रही हैं।

हालांकि मानसिक विकार ने भारत में काफी पहले से ही अपना पैर पसारना शुरू कर दिया था जैसा कि हमने बताया कि साल 2017 में बीस करोड़ मरीज मानसिक विकार से ग्रस्त हो चुके थें। इसका एक कारण ये भी है कि इस आधुनिक जमाने की बदलती जीवनशैली जो खासकर युवा अपना रहे हैं। सामान्य तौर पर देखा गया है कि मानसिक विकारों की शुरुआत 14 वर्ष की उम्र के आसपास या इसके बाद होती है। आजकल के युवा पीढ़ी का अपने घर-परिवार और समाज से संवाद बिल्कुल खत्म-सा हो गया है।

बातचीत का माध्यम प्रत्यक्ष रूप से न होकर इलेक्ट्रॉनिक माध्यम ने ले लिया है और वो है सोशल मीडिया। संवाद और आत्मीयता में कमी आने से युवा पीढ़ी में अकेलापन और असहिष्णुता तेजी से बढ़ रही है, जो कई तरह के मनोविकारों का मूल है। आज की बदलती जीवनशैली में तनाव और अवसाद घर से लेकर ऑफिस तक जीवन का हिस्सा बन गए हैं। भागमभाग भरी इस लाइफ में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर कोई किसी न किसी तरह के तनाव से जूझ रहा है।

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दुख तो इस बात का है कि आज भी भारत में ४३ प्रतिशत लोग ही ऐसे हैं जो मानसिक बीमारियों के इलाज के लिए अस्पताल जाने की जरूरत महसूस करते हैं। सर्वे की मानें तो भारत में हर बीस में से एक व्यक्ति अवसाद से ग्रसित है जिसकी वजह से बच्चों में भी तनाव, व्याकुलता और आत्मविश्वास में कमी जैसी मानसिक समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। यही कारण है कि भारत में आत्महत्या के आंकड़े भी तेजी से बढ़े हैं। हर उम्र, हर तबके के लोगों में जीवन से हार मान की लेने की प्रवृत्ति देखने को मिल रही है।

यह वाकई में एक चिंता का विषय बन चुका है इसलिए आप खुद को मानसिक विकार से बाहर निकालना चाहते हैं तो मनोचिकित्सक से संपर्क करने में बिल्कुल भी न सोचे। इसके लिए आप घर बैठे हमारे नेटवर्क के जरिए कई मनोचिकित्सक से परामर्श ले सकते हैं जिन्हें इस विषय पर बेहद ही अच्छा अनुभव है और वो आपको इन विकारों से दूर कर आपके जीवन को सरल व सहज बनाने में आपकी मदद करेंगे। आपकी मदद मनोचिकित्सक नितिन मेहरा आपकी मदद करेंगे।

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