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National Nutrition Week 2020: भारत में कुपोषण का संकट (The Crisis Of Malnutrition In India)

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कुपोषण

शरीर में अगर लंबे समय तक सन्तुलित आहार न मिले तो व्यक्ति कुपोषण का शिकार हो जाता है, कुपोषण के कारण बच्चों और महिलाओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है, जिसकी वजह से आसानी से कई तरह की बीमारियों के शिकार बन जाते हैं। अत: कुपोषण की जानकारियाँ होना अत्यन्त जरूरी है।

भुखमरी और कुपोषण एक ऐसा मुद्दा है जिसके बारे में लोग जानते तो हैं लेकिन ध्यान नहीं दे रहे हैं। सर्वे में प्राप्त डाटा के अनुसार दुनिया में भुखमरी लगातार बढ़ती ही जा रही है, जिसमें से करीब 23 फीसदी आबादी भारत में है। ऐसे में आप समझ सकते होंगे कि भुखमरी को लेकर भारत में कितनी ज्यादा गंभीर स्थिति बनी हुई है। भुखमरी पर यूएन की रिपोर्ट में जो बात सामने आई है उसमें यह बताया गया है कि 2030 तक भुखमरी मिटाने का अंतरराष्ट्रीय लक्ष्य भी खतरे में पड़ गया है।

सर्वे की मानें तो कुल आबादी के लिहाज देखें तो एशिया महाद्वीप में भुखमरी सबसे ज्यादा है और उसके बाद अफ्रीका और लातिन अमेरिका का नंबर आता है। वैसे देखा जाए तो भुखमरी के कई कारण हैं जिनमें युद्ध, संघर्ष, हिंसा, जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदा आदि के अलावा नवसाम्राज्यवाद, नवउदारवाद, मुक्त अर्थव्यवस्था और बाजार का ढांचा भी एक बड़ा कारण है। लेकिन आजतक इसपर संयुक्त राष्ट्र चुप है, ऐसे में देखा जाए तो एशिया का एक बड़ा भूभाग गरीब और विकासशील देशों से बना है।

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जो काफी समय तक गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, फिर भी इसी भूभाग में ऐसे देश भी हैं जो आर्थिक मोर्चे पर बड़ी ताकतों के समकक्ष माने जाने लगे हैं, जिनकी आर्थिक क्षमता के आगे बाकी देश कमजोर है, जिसमें चीन, कोरिया, जापान और भारत शामिल हैं। हालांकि इन देशों में चीन को महाशक्ति घोषित किया जा चुका है, अन्य चार देश सामरिक तौर पर विश्व के अग्रणी देशों में आ गये हैं। अंतरराष्ट्रीय जलवे के विपरीत, एशिया में भुखमरी की दर का विस्तार बताता है कि इस महाद्वीप की सरकारों की प्राथमिकताएं क्या हैं?

ऐसे में देखा जाए तो दुनिया के कुपोषितों में से 19 करोड़ कुपोषित लोग भारत में हैं जिसकी वजह से भारतीय आबादी के सापेक्ष भूख की मौजूदगी करीब साढ़े 14 फीसदी की है। देखा जाए तो भारत में पांच साल से कम उम्र के 38 प्रतिशत बच्चे सही पोषण के अभाव में जीने को विवश है जिसका असर मानसिक और शारीरिक विकास, पढ़ाई-लिखाई और बौद्धिक क्षमता पर पड़ता है।

भारत में कुपोषण को कम करने के लिये उपाय

आज के समय में कुपोषण किसी भी देश के लिए बेहद ही बड़ी समस्या है, इसकी समाप्ति किसी देश के विकास और समरसता को बनाए रखने के लिये ज़रूरी है। कुपोषण निर्धनता एवं असमानता के कभी न समाप्त होने वाले दुश्चक्र को जन्म देता है। ऐसी स्थिति में क़ानूनी अवसर की समानता भी लोगों को समान रूप से संसाधनों तक पहुँचने में सक्षम नहीं बना सकती है। हालांकि कुपोषण से निपटने के लिये निम्नलिखित प्रयास किये जा सकते हैं –

महिला सश्क्त्तीकरण एवं उनके स्वास्थ्य पर ज़ोर देकर यह समस्या खत्म की जा सकती है, हम ऐसा इसलिए महिलाएँ प्रायः किसी भी समाज की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिसके कारण वो कई कारणों से पीड़ित होती हैं। यह स्थिति जीवन पर्याप्त बनी रहती है। कुपोषण की समाप्ति के लिये महिलाओं को सशक्त होना बेहद जरूरी है। इसके लिये सबसे पहला काम होगा कि आँगनबाड़ी केंद्रों को अधिक सक्षम बनाना, साथ ही महिला शिक्षा को बढ़ावा देना भी जरूरी है। तभी तो कहा जाता है कि किसी भी स्वस्थ परिवार के लिये महिला का शिक्षित होना अत्यंत आवश्यक है।

सरकारी तंत्र का लोगों की ओर सकारात्मक रुझान होना भी जरूरी है, भारत में व्यापक भौगोलिक विविधता विद्यमान है। इसके चलते लोगों की स्वास्थ्य से संबंधित समस्याएँ भी अलग अलग हैं। ऐसे में केंद्रीय योजनाओं का निर्माण राज्यों एवं स्थानीय स्तर पर उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिये।

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भोजन की धारणीयता एवं पोषकता में वृद्धि करना, यानि की भारत में 40 प्रतिशत खाद्यान्न किसी-न-किसी रूप में बिना उपयोग के बर्बाद हो जाता है। यह खाद्यान्न भारत में भूख की समस्या को समाप्त कर सकता है।

ऐसे में ये कहना गलत नहीं है कि भारत को अगले पाँच वर्ष में 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था में बदलने के सरकार के लक्ष्य पर बहुत अधिक ध्यान दिया जा रहा है। इस समस्या पर गंभीर रूप से बहस करना बेहद आवश्यक है क्या सरकार इस लक्ष्य की प्राप्ति में सफल होगी लेकिन ऐसी आकांक्षा एक बड़ी वास्तविकता की अनदेखी करती ही नज़र आ रही है।

समाज का बड़ा हिस्सा जो देश की जनसंख्या का पाँचवा भाग है एक निर्धनतम हिस्से का निर्माण करता है और यह अभी भी उस आधुनिक अर्थव्यवस्था के स्पर्श से वंचित है जिसका फायदा दुनिया भर के देश उठाा रहे है। देश का एक हिस्सा 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था में जी रहा है और आधुनिक दौर की सभी वस्तुओं का उपभोग करने में सक्षम है। भारत में ही एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जिसे अपनी भूख मिटाने के लिये भोजन भी उचित मात्रा में उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।

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