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जन्माष्टमी विशेष : कृष्ण को क्यों प्रिय है मोरपंख ? (Why krishna wears Morpankh)

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कृष्ण

जब भी भगवान श्री कृष्ण की बात आती है तो हमारे मन मस्तिष्क में उनकी मनमोहक व मोरपंख वाली छवि बन जाती है। भगवान कृष्ण के बारे में अनेक कहानियां प्रचलित हैं। लोग उनके जन्म से लेकर जीवन तक की सभी अद्भुत कहानियों को आज भी सुनना पसंद करते हैं। इनके बाल समय की लीलाएं हो या फिर महाभारत में दिया गया ज्ञान सभी प्रचलित है और आज भी लोगों के जीवन को नई दिशा देने के काम आती हैं। लेकिन आज हम आपको कुछ ऐसा बताने जा रहे हैं जिसके बारे में आपको शायद ही पता होगा। दरअसल हम बात कर रहे हैं कृष्ण के उस मनमोहक छवि की जिसका सबसे अहम हिस्सा रहा है मोरपंख। अगर आपने गौर किया होगा तो हमेशा ही श्रीकृष्ण के साथ मोरपंख रहा है।

कृष्ण के मोरपंख प्रिय होने के पीछे प्रचलित कहानियां

आपको बताते चलें कि मोर पंख व भगवान कृष्ण का बेहद पुराना नाता है। इसे हम सामान्य रूप से पक्षी मोर का पंख समझते हैं लेकिन ये मोर भगवान श्रीकृष्ण के समय में अलग स्थान रखते थे। माता यशोदा बचपन से ही श्रीकृष्ण के सिर पर मोरपंख सजाती थीं लेकिन श्रीकृष्ण बड़े होकर खुद से भी अपने सिर मोरपंख सजाने लगे।

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राधा को अत्यंत प्रिय

दरअसल श्रीकृष्ण के सिर पर मोरपंख के कई सारी कथाएं प्रचलित हैं। जिसमें से एक कथा ये भी है कि जब श्रीकृष्ण भगवान बांसुरी बजाते थे तो राधा रानी मुग्ध होकर नृत्य करने लगती थीं। इस दौरान राधा जी को नृत्य करते देख वहां पर मोर आ जाते थे और उनके साथ वो भी झूमकर नाचने लगते थे। कृष्ण जी ऐसा देखकर बहुत खुश होते थे।

कहा जाता है कि इस दौरान जब एक बार मोर नाच रहे थे तो उनका पंख टूट गया। तो उस समय श्रीकृष्ण ने उस पंख को उठाकर अपने सर पर सजा लिया। जब राधा जी ने उनसे इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि इन मोरों के नाचने में उन्हें राधाजी का प्रेम दिखता है। इन कथाओं के आधार पर यह निश्चित होता है कि कृष्ण जी को मोर से बहुत प्यार और लगाव था, इसीलिए वो पंख को हमेशा अपने सर पर सजाते थे। हालांकि वैजयंती माला के साथ ही मोर पंख धारण करने की एक बड़ी वजह राधा से उनका अटूट प्रेम है। मात्र इस एक बात के अलवा अन्य बातें सिर्फ मनमानी है।

ब्रह्मचर्य का प्रतीक मोरपंख

राधा को प्रिय होने के अलावा श्रीकृष्ण को मोरपंख प्रिय होने के पीछे एक कहानी और है जिसमें बताया गया है कि कि मोर ब्रह्मचर्य का प्रतीक है, कहा जाता है कि मोर पूरे जीवन एक ही मोरनी के संग रहती है। यही नहीं मोरनी का गर्भ धारण मोर के आंसुओ को पीकर होता है। यही वजह है इतने पवित्र पक्षी के पंख को स्वयं भगवान श्री कृष्ण अपने मष्तक पर धारण करते हैं।

मोरपंख से दूर होते कृष्ण के ग्रहदोष

कई ज्योतिषियों व पंडितों का कहना है कि भगवान श्रीकृष्ण ने यह मोरपंख इसलिए धारण किया था क्योंकि उनकी कुंडली में काल सर्प दोष था। मोर पंख धारण करने से यह दोष दूर हो जाता है, लेकिन जो जगत पालक है उसे किसी काल सर्प दोष का डर नहीं।

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मोरपंख में कई रंग

कई लोग यह भी कहते हैं कि मोरपंख में सभी रंग समहाहित है। भगवान श्रीकृष्ण का जीवन कभी एक जैसा नहीं रहा। उनके जीवन में सुख और दुख के अलावा कई अन्य तरह के भाव भी थे। मोरपंख में भी कई रंग होते हैं। यह जीवन रंगीन है लेकिन यदि आप दुखी मन से जीवन को देखेंगे तो हर रंग बेरंग लगेगा और प्रसन्न मन से देखेंगे तो यह दुनिया बहुत ही सुंदर है बिल्कुल मोरपंख की तरह।

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