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जानें, योग कैसे बन गया योगा, अध्यात्म से कैसा है इसका संबंध ?

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योगा

आज हम दो ऐसे विषय के बारे में बात करेंगे जिसे आजतक आप अलग समझते थें, लेकिन ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि अध्यात्म का पथ प्रदर्शन योग की निरंतर साधना से ही संभव है। इसे समझने के लिए कई विद्वानों ने अलग अलग तर्क दिए हैं, आज हम आपको एक बेहद ही खास बात बताने जा रहे हैं। दरअसल योग हमारे भारत में प्राचीन समय से चलते आ रहा है, आधुनिक जमाने में इसे लोग योगा कहने लगे। हालांकि योग और योगा में बड़ा अंतर है।

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सामान्य रूप से तो हम सभी योगा को ही योग समझने लगे, जबकि योग तो शरीर, मन व बुद्धि को स्वस्थ करते हुए, आत्मस्वरूप तक पहुंचने का तरीका है। योग के जरिए हम अपनी चेतना की सबसे ऊंची स्थिति से जुड़कर जीवन जीने लगते हैं। इस प्रकार का जीवन, पूर्णता से भरा होता है। यही कारण है कि योग और आध्यात्म इन दोनों को एक दूसरे को पर्यायवाची माना जाता है। ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि अध्यात्म का पथ प्रदर्शन योग की निरंतर साधना से ही संभव है। इसे समझने के लिए कई विद्वानों ने अलग अलग तर्क दिए हैं।

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योग और योगा में बड़ा अंतर

अध्यात्म में देखें तो गीता को प्रमुख शास्त्र माना जाता है। गीता के सभी अठारह अध्यायों के नाम किसी न किसी योग पर ही रखे गए हैं। इसलिए अगर योग को अध्यात्म से अलग कर दिया जाए तो इसका कोई वजूद नहीं रहेगा। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि योग को अगर शरीर मान लें तो अध्यात्म उसका मस्तिष्क है। जैसे बिना मस्तिष्क के शरीर बेकार है वैसे ही बिना अध्यात्म के योग भी बेकार हो जाता है, और यह योगा हो जाता है। अध्यात्म के योग का जुड़ाव होने के कारण यह तन-मन को स्वस्थ रखने के साथ ही साथ मुक्ति मार्ग की साधना भी प्रदर्शित करता है।

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हालांकि आप इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि योग भारत से पाश्चात्य देशों में गया तब वह योगा बन गया, उदाहरण के रूप में जैसे राम- रामा और कृष्ण-कृष्णा हो गया। वहां केवल शारीरिक पक्ष को मजबूत और लचीला बनाने के लिए योगा का प्रचलन हुआ। धीरे-धीरे योग से अध्यात्म निकल गया और योग ने पूरी तरह योगा का रूप ले लिया। आज अधिकतर जो योगा जानते हैं, उनको अध्यात्म की पूरी समझ नहीं और जो अध्यात्म जानते हैं, उनको योग के शारीरिक पक्ष की समझ नहीं। इस प्रकार हमने, योग को दो भागों में बांट दिया है, जबकि योग जोड़ने के लिए है, बांटने के लिए नहीं।

वैसे देखा जाए तो योग विशेषज्ञों के प्रयास व जागरूकता से अब पाश्चात्य देशों में भी योग के आध्यात्मिक पक्ष की ओर भी रुझान बढ़ रहा है। इसलिए अब योग का ज्ञान देते समय अध्यात्म का ज्ञान देना भी इन विशेषज्ञों के लिए जरूरी है। योग के साथ-साथ अध्यात्म का ज्ञान प्राप्त करने से ही उसका सही अर्थ समझ आएगा और इसका लक्ष्य भी प्राप्त होगा। योग के माध्यम से ही आंतरिक शांति मिलती है। अगर योग का ज्ञान प्राप्त करने वाला व्यक्ति अध्यात्म का ज्ञान प्राप्त न कर सके तो वो योग के मूल स्वरूप से भटक जाएगा।

वहीं हम आसनों के अभ्यास से शरीर को स्वस्थ और लचीला बना सकते हैं, लेकिन योगी नहीं बन सकते हैं। अगर शरीर को लचीला बनाना योग है तो फिर तो सबसे बड़े योगी जिमनास्ट वाले हो जाएंगे, क्योंकि उनमें संतुलन, लचीलापन और फुर्ती। योगा से कभी भी भारत विश्व गुरु नहीं बन सकता, लेकिन योग की आध्यात्मिकता से भारत हमेशा विश्व गुरु ही रहेगा।

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योग गुरू योगेश्वर योगी से करें संपर्क

आप चाहे तो योग व अध्यात्म के बीच का ज्ञान प्राप्त करने के लिए Spark.live पर मौजूद योग गुरू योगेश्वर योगी के साथ संपर्क कर सकते हैं। योगेश्वर योगी योग टीचर और योग ट्रेनर हैं व ये हरिद्वार के निवासी हैं। योगेश्वर योगी का आध्यात्मिकता से गहरा संबंध है और ये सिर्फ कर्म और धर्म के नियम में विश्वास रखते है।

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