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ज्योतिष: क्या हमारे भावनाओं को सीधे रूप से प्रभावित करते हैं चक्र ?

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ज्योतिष का क्षेत्र काफी व्यापक है इसे समझना इतना भी आसान नहीं है। हालांकि इसके कई रूप व पहलू हैं जिसे विस्तृत रूप से जाना जाए तो पूरी जिंदगी लग सकती है। आज हम आपको इसके एक ऐसे पक्ष से रूबरू कराते हैं जिसके बारे में काफी कम लोग जानते हैं। सामान्यत हम यही जानते हैं कि ज्योतिष विद्या व्यक्ति को भूत−भविष्य व वर्तमान के बारे में पूरी जानकारी देती है लेकिन चक्र के बारे में आप नहीं जानते होंगे।

ये सबकुछ ग्रहों पर निर्भर करता है मनुष्यों को आने वाले सभी अच्छे−बुरे फलों के बारे में जानकारी हमें नवग्रहों की स्थिति से मिल जाती है। पर क्या आपको पता है कि ग्रहों का असर मानव शरीर की उत्पत्ति पर भी पड़ता है। प्रकृति की उत्पत्ति नवग्रहों से होती है और जब मनुष्य उत्पन्न हो जाता है तो ग्रहों के अंश प्रत्येक मानव शरीर के अंदर रहते हैं जिसे चक्र कहते हैं।

बताते चलें कि शरीर में सात चक्राकार घूमने वाले ऊर्जा केन्द्र होते हैं, जो कि मेरूदंड में अवस्थित होते है और मेरूदंड के आधार से ऊपर उठकर खोपड़ी तक फैले होते हैं। शास्त्रों व वेदों की मानें तो मां के गर्भ में जैसे−जैसे मानव शरीर का निर्माण हो रहा होता है उसके शरीर के पार्ट के साथ−साथ चक्रों के रूप में ग्रह और देवता भी इस शरीर में प्रवेश करते हैं जिसकी वजह से इन चक्रों के जरिए परमात्मा से हमारा सीधा संबंध हो जाता है।

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इनमें से प्रत्येक चक्र शरीर के विशिष्ट हिस्से से जुड़ा रहता है और उसे आवश्यक ऊर्जा उपलब्ध करवाता है। साथ में हर चक्र एक निश्चित स्तर तक के ऊर्जा कंपन को वर्णित करता है एवं विभिन्न चक्रों में मानव के शारीरिक एवं भावनात्मक पहलू भी प्रतिबिम्बित होते हैं। जैसे कि नीचे के चक्र शरीर के बुनियादी व्यवहार और आवश्यकता से जुड़े होते हैं तो वहीं ऊपर के चक्र उच्च मानसिक और आध्यात्मिक संकायों से संबन्धित हैं। आज हम बात करेंगे विशेषरूप से भावनाओं व चक्रों के बारे में, जिसे जानना हर व्यक्ति के लिए जरूरी होता है।

ये हैं वो सात चक्र

(1) मूलाधार – Muladhara – आधार चक्र

(2) स्वाधिष्ठान – Svadhisthana – त्रिक चक्र

(3) मणिपुर – Mauipura – नाभि चक्र

(4) अनाहत – Anahata – हृदय चक्र

(5) विशुद्ध – Visuddha – कंठ चक्र

(6) आज्ञा – Ajna – ललाट या तृतीय नेत्र

(7) सहस्रार – Sahasrara – शीर्ष चक्र

विस्तृत रूप से जानते हैं उन चक्र के बारे में जो हमारे शरीर को नियंत्रित करते हैं :

मूलाधार

यह पहला चक्र ग्रह है जो कि रीढ़ की हड्डी के नीचे स्थित होता है। ये मेष और वृश्चिक का शासक द्वारा शासित होता है यही नहीं शारीरिक रूप से मूलाधार काम-वासना को, मानसिक रूप से स्थायित्व को, भावनात्मक रूप से इंद्रिय सुख को और आध्यात्मिक रूप से सुरक्षा की भावना को नियंत्रित करता है। यह तीव्र ऊर्जा हमें सही निर्णय लेने में मदद करती है और हमें उत्साह से भर देती है।

स्वाधिष्ठान

स्वाधिष्ठान दूसरा चक्र उदर क्षेत्र के पास होता है और इसका स्वामी ग्रह बुध है जो कि कन्या और मिथुन राशि का शासक होता है। यह हमारे रचनात्मक कौशल को बढ़ाता है और तो बुध हमारे दिमाग को तेज करता है । शारीरिक रूप से स्वाधिष्ठान प्रजनन, मानसिक रूप से रचनात्मकता, भावनात्मक रूप से खुशी और आध्यात्मिक रूप से उत्सुकता को नियंत्रित करता है।

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मणिपुर चक्र

यह तिसरा चक्र चयापचय और पाचन तंत्र से संबंधित है। पेट में स्थित तीसरा चक्र और बृहस्पति जो कि धनु और मीन के शासक होता है। यह संतुलन और संतुष्टि को दर्शाता है और बृहस्पति हमारे नैतिक सिद्धांतों और ईमानदारी को विकसित करता है। ये तिसरा चक्र निजी बल, भय, व्यग्रता, मत निर्माण, अंतर्मुखता और सहज या मौलिक से लेकर जटिल भावना तक के परिवर्तन, शारीरिक रूप से मणिपुर पाचन, मानसिक रूप से निजी बल, भावनात्मक रूप से व्यापकता और आध्यात्मिक रूप से सभी उपादानों के विकास को नियंत्रित करता है।

अनाहत

जिसे हृदय चक्र के रूप में भी जाना जाता है, यह हृदय के पास स्थित है और प्रेम और सौंदर्य का प्रतिनिधित्व करता है। अनाहत का प्रतीक बारह पंखुडिय़ों का एक कमल है। शुक्र वृषभ और तुला के शासक माना जाता है जो कि आपको दयालु और प्यारा बनाता है। यह शारीरिक रूप से अनाहत से जुड़े मुख्य विषय जटिल भावनाएं, करुणा, सहृदयता, समर्पित प्रेम, संतुलन, अस्वीकृति और कल्याण है।

विशुद्धि

पांचवा चक्र हमारे गले में स्थित है और शनि इसका स्वामी होता है जो कि कुंभ और मकर राशि द्वारा शासित है। यह धार्मिकता और न्याय के लिए खड़ा है और शनि हमें जीवन में अनुशासित और स्थिर बनाता है। यह आत्माभिव्यक्ति और संप्रेषण जैसे विषयों, जैसा कि ऊपर चर्चा की गयी हैं, को नियंत्रित करता है।

आज्ञा

यह छठा चक्र माथे के पास स्थित है और जिसका स्वामी सूर्य होता है यह सिंह का शासक है। यह हमारे “स्व” का प्रतिनिधित्व करता है और सूर्य हमें एक ऐसी पहचान स्थापित करने में मदद करता है जो अद्वितीय और शक्तिशाली है। आज्ञा का मुख्य विषय उच्च और निम्न अहम को संतुलित करना और अंतरस्थ मार्गदर्शन पर विश्वास करना है।

सहस्रार

सातवां चक्र हमारे सिर के शीर्ष पर स्थित है और जिसका स्वामी चंद्रमा है जो कि कर्क राशि का शासक है। यह उस संबंध का प्रतिनिधित्व करता है जो हमारे पास ब्रह्मांड की ब्रह्मांडीय शक्तियों के साथ है और चंद्रमा हमें अपनी भावनात्मक प्रवृत्ति और आध्यात्मिक चेतना को विकसित करने में मदद करता है। सहस्रार का आतंरिक स्वरूप कर्म के निर्मोचन से, दैहिक क्रिया ध्यान से, मानसिक क्रिया सार्वभौमिक चेतना और एकता से और भावनात्मक क्रिया अस्तित्व से जुड़ा होता है।

अब आपको ये तो समझ आ ही गया होगा कि ये सातों चक्र किस तरह से हमारी भावनाओं, विचारों और दृष्टिकोण को प्रभावित करते हैं और हमें अपने व्यवहार का प्रदर्शन करने में मदद करते है। यह कहना गलत नहीं होगा कि ज्योतिष के साथ चक्रों के विज्ञान को जोड़कर, हम ग्रहों को इस तरह से संरेखित कर सकते हैं कि वे चक्रों को सशक्त बनाने और हमारे शरीर, मन और आत्मा को सक्रिय करके हमें एक बेहतर व्यक्ति बनाते हैं।

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