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जानें, मानसिक स्वास्थ्य के लिए भारत किस हद तक है प्रतिबद्ध

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Mental Health india

भारत में मानसिक स्वास्थ्य की क्या स्थिति है इस बात पर बहस आजकल और ज्यादा छिड़ गई है। हर कोई इसके बारे में बात करने लगा है, दरअसल हाल ही में बॉलीवुड के जाने माने सफल अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने आत्महत्या जैसे कठोर कदम को उठाकर लोगों को मेंटल हेल्थ के बारे में बात करने व सोचने को मजबूर कर दिया।

मानसिक विकार भारत में जिस तरह से बढ़ रहा है उसे देखकर यह तो समझ आ गया है कि ये किसी को भी अपने चपेट में ले सकता है। इसे समझने में अगर जरा सी भी देर हुई तो व्यक्ति खुद की जान गवां बैठता है। इसलिए जरूरत है कि भारत में मेंटल हेल्थ जैसे मुद्दे पर सरकार कोई शख्त निर्णय ले और लोग भी इसे सीरियस रूप में लें।

मानसिक स्वास्थ के आंकड़ें

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हाल ही में लांसेट साइकाइट्री मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सर्वे पेश किया है जिसमें प्रस्तुत आंकड़ो के आधार पर बात करें तो भारत में 1990 से लेकर 2017 तक मेंटल हेल्थ को लेकर जो स्थिति सामने आई है वो काफी दयनीय है। आंकड़ें कहती है कि साल 2017 में हर सातवें में से एक भारतीय किसी न किसी तरह के मानसिक रोग से पीड़ित है। इनमें से सबसे ज्यादा अवसाद के रोगी हैं। भारत में मानसिक रोगों में सबसे ज्यादा भागीदारी अवसाद की है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो मानसिक रूप से ग्रसित अवसाद मरीजों की संख्या में भारत सबसे आगे है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी मानसिक स्वास्थ्य को लेकर कई सारे प्रोग्राम भी शुरू किए जिसमें दुनिया भर के देश अपने देश के मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित सभी डाटा का विश्लेषण भी किया। मौजूदा आंकड़ों के आधार पर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने यह भी कह दिया अगर मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दिया गया तो 2030 तक मानसिक स्वास्थ्य एपिडेमिक बन जाएगा। जो सभी देश और देशवासियों के लिए घातक होगा। यही नहीं इस स्थिति ऐसे में भारत के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर आये ऐसे आंकड़ें और चिंताजनक हैं।

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हालांकि दुनिया के बाकी देशों से तुलना की जाए तो भारत मानसिक स्वास्थ्य की गंभीरता को समझने में आज भी काफी पीछे है। बड़े-बड़े विकसित और विकासशील देश मेंटल हेल्थ की गंभीरता को समझ चुके है इसलिए वो उस पर विशेष रूप से ध्यान दे रहे हैं। बात करें बाकी देशों इटली, जर्मनी, हंगरी, न्यूजीलैंड, नीदरलैंड, जापान जैसे देश स्वास्थ्य बजट में मेन्टल हेल्थ पर विशेष रूप से ध्यान देने लगे हैं। इससे बात तो साफ है कि विश्व के बहुत से देश मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से ले रहे हैं और उस पर काम कर रहे हैं जिसमें भारत अभी बहुत पीछे है।

मानसिक स्वास्थ्य : इन बातों पर देना होगा ध्यान

इन बातों से तो हमें समझ जाना चाहिए कि आज के समय में समाज और हमारे आस पास के लोगों को ये बात समझना बहुत आवश्यक है क्योंकि मेंटल हेल्थ कितना महत्वपूर्ण विषय है और उस पर ध्यान देना उससे भी ज्यादा आवश्यक है। लोगों को ऐसा लगता है कि उन्होंने ऐसा कुछ महसूस नहीं किया तो ऐसा कोई रोग का कोई अस्तित्व ही नहीं है।

इस सोच से बाहर आना बहुत आवश्यक है क्योंकि अगर इससे बाहर नहीं आएंगे तो मानसिक रोग से पीड़ित लोगों की सहायता कैसे की जाएगी। हमारे देश में मानसिक स्वस्थ्य को लेकर जो व्यवहार किया जाता है चाहे वो समाज के द्वारा हो या सरकार के द्वारा हो वो उचित नहीं है क्योंकि ये इतनी बड़ी समस्या है। अगर इसका सही ढंग से समाधान नहीं निकाला गया तो भविष्य में जाकर ये भयावह रूप ले लेगा और हम न जाने कितने अपनो को खो देंगे।

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