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मयूरभंज छाऊ नृत्यशैली: रामायण, महाभारत के युद्ध गथाओं और भावनाओं का अनोखा संगम

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सिनेमाई संस्कृति ने हमारी अनमोल भारतीय लोक संस्कृति का किस हद तक नुकसान पहुचाया है, इसका अंदाज़ा हम इस बात से लगा सकते हैं कि रीमिक्स के इस दौर में हमने अपने पारंपरिक त्योहारों, संगीत, साहित्य, नृत्य, परिधान, रहन-सहन आदि में पश्चिमी सभ्यता का तड़का लगा कर ना सिर्फ़ हमने अपने भारतीय सांस्कृतिक धरोहर को फूहड़ बना दिया है, बल्कि इसके प्रभाव से कई लोक संस्कृति विलुप्त होने के कागार पर भी हैं.

विश्व मंच पर भारत अपनी लोकसंस्कृति के लिए जाना जाता है. हमारे लोकनृत्य, लोकनाट्य, लोकसंगीत, लोककलायें, लोक परंपरायें हमारी अनमोल धारायें हैं. अगर भारतीय लोकनृत्य की बात करें तो जन-जीवन का स्वाभाविक चित्रण जो हमारे संस्कृति में मिलता है वह दुनिया के किसी और नृत्य शैली में मौजूद नही है. उदाहरण के तौर पर असम का बिहू, बिछूवा; अरुणाचल प्रदेश के मुखौटा और युद्ध नृत्य; हिमाचल प्रदेश के रासलीला; बीहार के करमा, जातरा आदि में उनके लोकजीवन का सजीव झाँकी दिखती है. ऐसी ही भारतीय संस्कृति का अनमोल धरोहर है मयूरभंज छाऊ नृत्य.

मयूरभंज छाऊ नृत्य या छाऊ भारत का प्राचीनतम नृत्य है. इसमें महाभारत, रामायण, लोकसाहित्य पर आधारित कथाओं आदि को इतने मनोहर और सुंदर तरीके से अभिनय किया जाता है कि इसे देखते समय ऐसा अनुभव होता है जैसे आप समय सीमा को लाँघ कर किसी महाभारत, रामायण आदि काल के भावनाओं को जीवित देख रहें हैं. इस नृत्‍य शैली को विशाल पुरातनी जीवनी और पौरुष की श्रेष्‍ठ पराकाष्‍ठा कहना बिल्कुल भी ग़लत नही होगा जिसे मनमोहक भाव-भंगिमाओं के साथ अद्भुत रूप में पेश किया जाता है.

राजेश साई बाबू, मयूरभंज छऊ नृत्य के एक विख्यात गुरु हैं. उनकी पहचान बॉलीवुड में भारतीय लोक नृत्य जैसे गरबा,कालबेलिया, डांडिया के स्थापित कलाकार और कोरियोग्राफर के रूप में होती है. राजेश साई बाबू कहते हैं कि

“मयूरभंज छऊ नृत्य शैली पश्चिम बंगाल, बिहार और उड़ीसा के पड़ोसी राज्यों में अपने पारंपरिक रूप में देखने को मिलती है. छाऊ या ‘मयूरभंज छऊ’ एक प्रकार की नृत्य नाटिका है जिसमें युद्ध भावनाओं को सौंदर्य के धागे में बड़ी ही खूबसूरती के साथ पिरोया जाता है. इसमें रामायण और महाभारत तथा पुराणों में वर्णित अलग-अलग कहानियों को आधार बनाकर अभिनय के नृत्यरूप में पेश किया जाता है.महाभारत या रामायण से प्रेरित युद्ध जैसी चेष्टाओं, भाव-भंगिमायें बुराई पर अच्‍छाई की विजय जैसे उदाहरण एक नृत्य के रूप में देखना भावनाओं के समुंदर में गोता लगाने जैसा है.”

छऊ नृत्य की तीन प्रमुख शैलियाँ हैं जो उन तीन क्षेत्रों के नाम पर हैं जहाँ यह खेला जाता है. उदाहरण के लिए – पुरुलिया (प.बंगाल) की छऊ, सरायकेला (झारखण्ड) की छऊ तथा मयूरभंज (ओडिशा) की छऊ के नाम से जाना जाता है. इन तीनों उपशैलियों में जो अंतर है वह मुख्यतः मुखौटों के प्रयोग को लेकर है. सरायकेला और पुरुलिया शैली में नृत्य के समय मुखौटे लगाये जाते हैं, पर मयूरभंज छऊ में मुखौटों का प्रयोग नहीं होता है. पर यह विडंबना है कि ऐसी सुंदर नृत्य शैली अब विलुप्त होती जा रही है. जिसे जीवित रखने का कार्य राजेश साई बाबू का परिवार दशकों से करता आ रहा है.

राजेश साई बाबू को मयूरभंज छऊ नृत्यशैली उन्हे विरासत में मिली हैं. वे संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित और मयूरभंज छऊ नृत्य के विख्यात गुरू अनंत चरण साई बाबू के पोते हैं. मयूरभंज छऊ नृत्य कौशल के विरासत को आगे ले जाते हुए उन्होने अपने पिता और भाई के साथ मिलकर दिल्ली में ‘गुरुकुल छऊ नृत्य संगम’ नामक नृत्य संस्था से इस पारंपरिक लोक नृत्य को जीवित रखने का कार्य कर रहें हैं.

अगर आप भी महापुरुषों की जीवनी और पौरुष गाथा को चित्रित करती इस अनमोल भारतीय लोकनृत्य शैली को सीखना और इस संस्कृति को जानना चाहते हैं तो हमारे नेटवर्क से जुड़े मयूरभंज छऊ गुरु राजेश साई बाबू से ऑनलाइन सत्र में इस नृत्य कौशल की बारीक़ियाँ सीख सकते हैं और मयूरभंज छऊ नृत्यशैली के विरासत को आगे ले जा सकते हैं.

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