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शोध: कोरोना से ठीक हुए मरीज मानसिक रूप से हो रहे हैं बीमार| Development of Mental illness in Covid-19 Survivors

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कोरोना
कोरोना काल ने दुनिया भर के लोगों को हिलाकर रख दिया, चाहें कोई भी देश क्यों न हो हर कोई इस महामारी से त्रस्त है। आज तक हर कोई यही इंतजार कर रहा है कि कब वो वापस से अपनी जिंदगी पटरी पर ला सकेगा। हालांकि पहले की अपेक्षा अब लोग धीरे-धीरे बाहर तो निकल रहे हैं लेकिन कोरोना का डर हर किसी के मन में है। हो भी क्यों न भला इस बीमारी ने कई हजार लोगों को मौत के मुंह में धकेल दिया, ये वायरस लोगों की सोच से ज्यादा खतरनाक है।

जब तक इसकी कोई वैक्सीन नहीं बन जाती तब तक लोगों को इसके प्रति डर खत्म नहीं होगा। वैसे अभी तक लोग यही समझते आ रहे हैं कि कोरोना से शारीरिक स्वास्थ्य पर ही असर पड़ता है लेकिन सच तो यह है कि यह न सिर्फ शारीरिक तौर पर लोगों को प्रभावित कर रहा है बल्कि मानसिक तौर पर भी बीमार कर रहा है। कोरोना से पीड़ित मरीजों में ये भी देखने को मिला है कि जिनकी इम्युनिटी कमजोर है उनपर ये वायरस जल्द अटैक करता है और उस व्यक्ति की मौत होने की संभावना भी बढ़ जाती है।

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सर्वे : कोरोना संक्रमितों में मानसिक बीमारी का हो रहा विकास

कोरोना संक्रमण के ग्राफ में भले ही गिरावट दर्ज की जा रही हो, मगर इसके दुष्प्रभावों की संख्या बढ़ती जा रही है। ये हम नहीं कह रहे हैं बल्कि सर्वे में पता चला है कि जो लोग कोरोना से संक्रमित हुए वो भले ही इस संक्रमण से निकलकर बाहर आ गए हों लेकिन उनमें मानसिक समस्या उत्पन्न हो गई है। ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के एक बड़े अध्ययन में पाया गया कि जो लोग इस बीमारी से लड़कर जीवित बचे हैं उनके अंदर चिंता और अवसाद जैसी मानसिक बीमारियां विकसित होने का खतरा अधिक होता है।

दरअसल अमेरिका में 69 मिलियन लोगों के स्वास्थ्य रिकॉर्ड का विश्लेषण किया, जिसमें 62,000 से अधिक लोग शामिल थे जो कि कोविड से संक्रमित थें, उन्होंने पाया कि कोरोनो वायरस से संक्रमित 20% लोगों को 90 दिनों के भीतर एक मनोरोग विकार का निदान किया गया था। यही कारण है कि अब दुनिया भर के डॉक्टरों को ये चिंता हो गई है कि कोरोना से जो लोग बच गए हैं उनमें मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का अधिक खतरा होगा। ऐसे में आवश्यकता है कोरोना के इलाज के साथ साथ मानसिक बीमारियों से लड़ने के लिए तैयार होने की।

इसके अलावा भारत में भी जब इस बारे में गंभीर रूप से सर्वे किया गया तो पाया गया कि वर्तमान में समय में कोरोना काल का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव मानसिक तनाव है। स्वास्थ्य विभाग ने अब तक ऐसे 11,602 कोरोना संक्रमित मरीजों की काउंसिलिंग की, जो कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में मानसिक बीमारी से गुजर रहे थे। स्थिति यह है कि आज के समय में हर रोज मिलने वाले औसतन 2,300 मरीजों में 250 मरीजों को मनोरोग काउंसलर की जरुरत पड़ रही है।

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मानें तो कोरोना काल में आमतौर पर सबसे ज्यादा लोगों को मानसिक समस्याओं से जूझते देखा जा रहा है इस दौरान सबसे ज्यादा लोग तनाव, चिंता व डर से ग्रसित हैं। जिसके कारण उनके जीवन में कई समस्याएं आ रही है, नकारात्मक प्रभावों के कारण एक तरफ जहां व्यक्ति कोविड से ठीक हो रही हैं वहीं वो मानसिक रूप से ग्रसित भी हो रहे हैं। इसका एक कारण ये भी हो सकता है कि समाज में लोग उन्हें अलग नजरिए से देखते हैं।

हालांकि वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर डॉक्टरों को मस्तिष्क से जुड़े लक्षण और बीमारियों के संकेत संक्रमण से ठीक हुए लोगों में नजर आए तो समय रहते पहचान कर उपचार और देखभाल के लिए तैयार रहें।

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मानसिक बीमारी के कारण

कोरोना संक्रमित लोगों में मानसिक बीमारी के लक्षण पाए जाने के कई कारण हो सकते हैं, लोग तनाव से ग्रसित हो जा रहे हैं।

सबसे पहले तो ये बता दें कि कोरोना संक्रमित होने की वजह से मरीज का शरीर कमजोर पड़ जाता है जिसकी वजह से उसे तरह-तरह की अन्य बीमारी भी घेर लेती हैं, वहीं ठीक होने के बाद भी व्यक्ति में बीमारी पाई जा रही है जो मनुष्य के अंदर मानसिक बीमारी को जन्म देते है। यही नहीं कोरोना से मौत का डर सबसे बड़ा मानसिक तनाव का कारण है, जगह-जगह से डेथ बॉडी के फोटो, उन्हें परेशान कर रहे हैं। ये बातें खुद मरीजों ने काउंसर से कहीं।

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