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लॉकडाउन: अकेलापन व अत्यधिक सोचकर हो गए हैं परेशान तो करें ये काम

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कोरोना काल में हुए इस लॉकडाउन ने हर किसी को कहीं न कहीं असर तो जरूर किया है लेकिन सबसे ज्यादा प्रभाव अगर पड़ा है तो वो है मेंटल हेल्थ पर। जी हां एकाएक मानों जीवन का पहिया रूक सा गया है। लंबे समय से चल रहे इस लॉकडाउन के कारण लोगों में अकेलापन व मानसिक तनाव का आना जाहिर सी बात है। हालांकि लॉकडाउन की वजह से लोगों की दिनचर्या में कई तरह की समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं जिसकी वजह से मेंटल हेल्थ समस्याएं भी उत्पन्न होना स्वभाविक हो गया है। इसके पीछे कई सारे कारण हो सकते हैं।

एक तरफ जहां कुछ लोग इस लॉकडाउन के कारण अपने परिवारों, रिश्तेदारों और दोस्तों से दूर हो गए हैं जिसकी वजह से अकेलापन उन्हें खाए जा रहा है। वहीं दूसरी ओर कई लोग घर से काम कर रहे हैं, बिजनेस भी बंद हैं, ऐसे में घरों में कैद होकर ज्यादा सोचने के कारण लोग डिप्रेशन यानि की मानसिक तनाव की चपेट में आ रहे हैं। हैरानी की बात तो ये हैं कि इतने लंबे समय तक लॉकडाउन चलने के बावजूद आज भी कोरोना से जुड़ी राहत की कोई खबर सुनने को नहीं मिल रही है।

आज हम आपसे विशेषरूप से इन्ही समस्याओं पर बात करेंगे, कि आखिर कैसे आप इनसे बाहर निकल सके क्योंकि अगर आपको अकेलापन व तनाव सताता है तो इसका असर धीरे-धीरे आपके शारीरिक स्वास्थ पर भी पड़ेगा।

मानसिक बीमारी है अकेलापन

मनोवैज्ञनिक की मानें तो अकेलापन एक बीमारी भी है जिसका आपकी सेहत पर बहुत ही ज्यादा बुरा असर पड़ता है। ये कब धीरे धीरे आपके आत्मविश्वास को कमजोर कर देता है इसका पता आप खुद भी नहीं लगा पाते हैं। ये लंबे समय तक अकेले रहने की वजह से होता है, अकेलेपन की गिरफ्त में आते ही व्यक्ति के अंदर बिना मतलब गुस्सा और चिड़चिड़ापन के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। बात इतने पर ही खत्म नहीं होती जब यह अपने चरम सीमा पर पहुंचता है तो कई बार लोगों में अल्जाइमर या फिर डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारियां भी उत्पन्न होने लगती है इसलिए जरूरी है कि वक्त रहते ही आप इन समस्याओं से निपटने के लिए मनोवैज्ञानिक से संपर्क करें। अपने समस्या के बारे में उन्हें खुलकर बताएं ताकि वो इससे बाहर आने में आपकी मदद कर सके।

अत्यधिक सोचकर होते हैं तनाव का शिकार

इंसान के जीवन में उदास व निराश होना स्वाभाविक है, लेकिन जब यह समस्या लंबे समय तक आपके साथ होती है तो तनाव की स्थिति में व्यक्ति पहुंच जाता है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव एक आम समस्या बन चुका है। छोटे से लेकर बड़े तक, आज के समय में हर तीसरा व्यक्ति इस समस्या से जूझ रहा है। कई लोगों को आपने देखा होगा कि उन्हें अत्यधिक सोचने की आदत होती है, ऐसे लोग भी तनाव की गिरफ्त में बेहद जल्द आ जाते हैं।

मनोवैज्ञानिक की मानें तो यह एक ऐसा मानसिक विकार है, जिसमें व्यक्ति को कुछ भी अच्छा नहीं लगता। उसे अपना जीवन नीरस, खाली-खाली और दुखों से भरा लगता है। हालांकि हर व्यक्ति को अलग अलग वजहों से तनाव उत्पन्न होता है। किसी बात या काम का अत्यधिक दवाब लेने से या फिर ज्यादा सोचने या अकेलापन होने से भी यह समस्या जन्म लेती है।

इससे ग्रस्त व्यक्ति न तो ठीक से काम कर पाता है और न ही अपने जीवन का खुलकर आनंद उठा पाता है। कार्यशैली और संबंधों पर बुरा असर पड़ने के चलते उसमें जीने की इच्छा भी खत्म हो जाती है। तनाव पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। बदलते सामाजिक परिवेश में महिलाएं बड़े पैमाने पर तनाव की शिकार हो रही हैं। इनमें कामकाजी महिलाओं की तादाद सबसे अधिक है इसके पीछे भी कारण है अत्यधिक सोचने की जैसा कि आपको भी पता होगा पुरूषों की अपेक्षा महिलाएं ज्यादा सोचती हैं।

वैसे इतिहास साक्षी है कि इस बात का कि ऐसी महामारियों के दौर में लोगों की घुटन बढ़ने लगती है, ऐसे में अकेलापन बढ़ता है, असुरक्षा महसूस होता है, अविश्वास व तनाव उत्पन्न होता है। जिसे दूर करने में मनोवैज्ञानिक विनीता एम.हरिया आपकी मदद कर सकती हैं।

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