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क्या इस देश में महिलाएं वास्तव में स्वतंत्र हैं?

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समाज में महिलाओं से जुड़े दुष्कर्म और अत्याचार के बारे में आए दिन हम अखबारों टीवी और सोशल मीडिया पर सुनते रहते हैं।  सोशल मीडिया के ज़रिये कई लोग समाज में हो रहे इन अपराध के बारे में आवाज़ भी उठाते हैं लेकिन यहाँ सबसे बड़ा सवाल ये है की इन सब के बावजूद महिलाओं के खिलाफ होने वाले दुष्कर्म के मामले कम होने की जगह बढ़ क्यों रहे हैं? देश के 73 सालों की स्वतंत्रता के बावजूद महिलाएं इस देश में स्वतंत्र क्यों नहीं ? राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2017 में महिलाओं के खिलाफ कुल 3,59,849 मामले सामने आए जो 2016 में 3.38 लाख तो 2015 में 3.2 लाख थे। यानी 2015 से 2017 के बीच महिलाओं के खिलाफ होने वाले मामलों में बढ़ोतरी हुई है।  

इस तरह के मामले जब भी देश में आक्रोश का माहौल बना देते हैं, हर व्यक्ति आरोपियों के लिए मौत की सज़ा मांगता है। लेकिन क्या सिर्फ इतना काफी है ? आए दिन इस तरह के मामले सिर्फ आरोपी पर ही नहीं बल्कि समज पर भी एक बड़ा सवाल खड़ा करते हैं। क्या महिलाओं के खिलाफ दुर्व्यवहार के ज़िम्मेदार सिर्फ आरोपी होते हैं या कहीं न कहीं समाज भी इसका ज़िम्मेदार है ? एक लम्बे समय से महिलाओं को समाज में अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ा है फिर चाहे वो सती प्रथा हो, या विधवाओं को सम्मान देने की। आज भी ज़्यादातर लोगों का यही मानना है की महिलाएं घर संभालने के अलावा किसी दूसरे काम के लिए नहीं बनी।  

महिलाओं के साथ रेप, दुष्कर्म घरेलू अत्याचार जैसे कई मामले आए दिन हम सुनते रहते हैं।  देश को शर्मसार करने वाली ऐसी ही एक घटना साल 2012 में हुई थी जब देश में शोक और गुस्से का महल था और अब एक बार फिर साल 2019 में हैदराबाद में एक ऐसे ही शर्मनाक हरकत को अंजाम दिया गया जब एक पशु चिकित्सक का बलात्कार कर उन्हें जला कर फेक दिया गया। जिसके बाद देश भर में इस मामले को लेकर दुःख और आक्रोश का माहौल देखा गया।  लेकिन महत्वपूर्ण सवाल ये है की इस तरह की प्रतिक्रिया के लिए ऐसे बड़े मामलों का सामने आना ज़रूरी है ? और अगर देखा जाए तो इस आक्रोश का भी कुछ फायदा नहीं होता हैदराबाद के इस मामले में एक तरफ लोग आवाज़ उठा रहे हैं तो इसी बीच बिहार में एक लड़की का रपे कर उसे गोली मार दिया गया और इसके बाद उसके शरीर को जला दिया गया। इतना ही नहीं महिला के रेप का मामला राजस्थान और कर्नाटक में भी सामने आया। 

महिलाओं के खिलाफ देश की कानून व्यवस्था की बात की जाए तो रेप के ऐसे दुर्लभ मामलों के लिए फ़ास्ट ट्रक कोर्ट की व्यवस्था की गई है। 2012 के निर्भया गैंगरेप और हत्या मामले के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक एनजीओ को 16 बलात्कार के मामलों की प्रगति की निगरानी करने के लिए कहा था। इसे बलात्कार के मामलों में फास्ट ट्रैक अदालतों द्वारा आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) द्वारा निर्धारित समय के खिलाफ परीक्षण करना था, जिसमें कहा गया था कि बलात्कार के मामलों में मुकदमा 60 दिनों में पूरा किया जाना चाहिए। 

लेकिन 2017 में दिल्ली स्थित एक गैर सरकारी संगठन द्वारा किये गए इस अध्ययन के रिपोर्ट अनुसार बलात्कार के मामलों में मुकदमे को खत्म करने का औसत समय फास्ट ट्रैक अदालतों में आठ महीने था। ये आंकड़े तब, जब भारत में सभी मामले फ़ास्ट ट्रैक में जाते भी नहीं। निर्भया मामले में भी सात साल बीत जाने के बावजूद मामले को बंद करने के माध्यम से न्याय दिया जाना बाकी है। एक दोषी की दया याचिका केवल 1 दिसंबर को खारिज कर दी गई थी। सभी चार दोषियों को मौत की सजा दी गई थी। बात सिर्फ इतनी सी है की जब तक पुलिस और अदालतें किसी मामले को बंद करती हैं, तब तक अपराध की घटना लोगों की स्मृति से हट जाती है, जिसमें भावी बलात्कारी भी शामिल हैं। महज़ निंदा करने, आक्रोश से  करने से कोई फायदा नहीं होगा। बल्कि इन मामलों में तुरंत सुनवाई और कड़ी से कड़ी कार्रवाई की ज़रूरत है। 

ऐसे मामलों को जड़ से ख़त्म करने की ज़रूरत है आज महिलाओं के लिए स्थान चाहे कोई भी हो दफ्तर, सड़क, स्कूल सुरक्षित नहीं। 2 साल की बच्ची हो या 60 वर्ष की वृद्ध महिला हमारे देश में कोई भी सुरक्षित नहीं। हलाकि सरकार ने

महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई तरह के नियम कानून लागू किये हैं लेकिन इसके बावजूद ऐसे मामलों में कमी नहीं आई है। दुष्कर्म के कितने ही ऐसे मामले हैं जो सामने भी नहीं आते इसकी वजह सिर्फ इतनी की समाज में महिला का नाम बदनाम होगा। दुष्कर्म का शिकार होने के बावजूद महिलाओं को चुप रहने की सलाह दी जाती है और ये समाज में मौजूद लोग ही कहते हैं। समाज में मौजूद ये ओछी सोच कहीं न कहीं जुर्म को बढ़ावा देती है। 

महिलाओं को लेकर समाज में चली आ रही इन सभी दक़ियानु सी बातों के बीच कई महिलाओं ने खुद को साबित किया और महिलाओं के मन में उम्मीद की एक किरण जगाई। इसके बावजूद आज भी महिलाओं को अपने हक़ और सुरक्षा के लिए समाज में संघर्ष करना पड़ता है।  रोज़मर्रा की ज़िंदगी में किसी भी महिला के लिए घर से बहार निकलना मुश्किल हो जाता हैं क्योंकि समाज में मौजूद कुछ मानसिक रूप से बीमार लोग बदलाव का हिस्सा नहीं बनना चाहते और आज भी दकियानूसी ख्यालात रखते हैं। हम सबको अपनी सोच को बदलकर महिलाओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा देने के साथ उनके लिए एक सुरक्षित माहौल को भी कायम करना चाहिए।  तब ही संपूर्ण तरीके से समाज में बदलाव आएँगे और देश में उन्नति होगी।  


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